फल की खेती से दुनिया में नाम कमा रहा रतलाम का किसान

फल की खेती से दुनिया में नाम कमा रहा रतलाम का किसान

amit nigam
रतलाम । वर्तमान में सरकार द्वारा खेती को बढावा देने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं और कई योजनाएं भी संचालित की जा रहीं है। वहीं रतलाम जिले के तीतरी गांव के किसान लक्ष्मीनारायण पिछले 40 साल से उन्नत खेती कर रहे हैं प्रदेश से लेकर पूरी दुनिया में नाम कमा रहे हैं। रतलाम के उन्नत कृषक लक्ष्मीनारायण समय के साथ उन्होंने खुद को प्रोन्नत किया। विपरीत परिस्थितयों में हौंसला नहीं छोडा। विदेश जाकर प्रशिक्षण लिया और नई विधियां अपनाई । बाद में उन्होंने स्ट्राबेरी, अनार और एप्पल बेर की भी खेती शुरू की । फलों की इस खेती से उन्हें दौलत और शोहरत दोनों मिली। 

परम्परागत खेती को छोड़कर 20 एकड़ में अंगूर की खेती शुरू की
लक्ष्मीनारायण पाटीदार ने रतलाम जिला कलेक्टेट में कुछ दिन नौकरी भी की, 1985 में वकालत शुरू की। लेकिन दो साल बाद पिताजी ने खेती पर ही ध्यान देने को कहा, तो कुछ अनूठा करने की सोची और परम्परागत खेती को छोड़कर 20 एकड़ में अंगूर की खेती शुरू की। जिसके पौधे महाराष्ट्र से लाए गए । समय के साथ इसमें स्ट्राबेरी ,अनार और एप्पल बेर को भी शामिल किया,जिन्हें तितरी जैसे छोटे गांव में मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाना और उत्पादन लेना बड़ी चुनौती थी, लेकिन उन्होंने विकलांगता के बावज़ूद हार नहीं मानी और अंततः सफलता हासिल की।

फसल के पौधे और बीज ऑस्ट्रेलिया मंगाते हैं
किसान लक्ष्मीनारायण ने बताया कि वे फल के पौधे ओर बीज ऑस्ट्रेलिया से मंगाते हैं। उन्होने बताया वे पौधे और बीज अपने यहां के मुकाबले ज्यादा अच्छे होते हैं। उनमें अच्छी फसल और ज्यादा पैदावार भी होती है । 

विदेश से मंगाते हैं लिक्वड, यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं
लक्ष्मीनारायण ने बताया कि वे अपनी फल की फसल में यूरिया डीएपी आकद रासायनिक खाद नहीं डालते। फसल के लिए गोबर की खाद खरीदते हैं और वही खाद खेत में डालते है। उन्होंने बताया कि हम कुछ खाद जो लिक्वड रूप में होती है विदेश से मंगाते हैं। पशुपालन सिर्फ घर की आवश्यकता के अनुसार ही करते हैं।

यांत्रिक विधि से छिड़काव
श्री पाटीदार बताते हैं, इजराइल जाकर ड्रिप इरिगेशन, मल्टीपल स्प्रेयर की तकनीक देखी और उसे अपने खेतों में उपयोग में लिया है। बगीचों में दवा छिड़काव के लिए लगभग बीस वर्ष पूर्व माइक्रो स्प्रेयर एवं छोटा जापानी ट्रैक्टर लेकर आया। इससे 10 से 20 फीट ऊंचे पौधों पर दवा के छिड़काव में आसानी होती है।

नोबल बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज़ किया नाम 
उन्हें  जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार मिले हैं । गत दिनों विदेशी एजेंसी द्वारा उनके कृषि कार्यों का मूल्यांकन करते हुए उनका नाम नोबल बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज़ किया गया है, जो वस्तुतः उनकी उद्यानिकी कृषि के प्रति कर्मठता, समर्पण और सतत सक्रियता का सम्मान है, जिसके वे हक़दार हैं। इससे उनके कृषि कार्यों को मान्यता मिली है। इसका लाभ निश्चित ही कृषक वर्ग और समाज को मिलेगा।

इजराइल और मिस्र में 15 दिनों का प्रशिक्षण लिया 
श्री पाटीदार ने 1998 में निजी खर्च से इजराइल और मिस्र की यात्रा की और वहां फलों की उन्नत तकनीक का 15 दिनों का प्रशिक्षण लिया जिसे तितरी में लागू किया । वहां Y आकार में अंगूर की बेलों का ढांचा बनता है , जिससे प्रकाश संश्लेषण अच्छा होने से फल मीठे और वजनदार होते हैं। पत्तियां भी पीली नहीं पड़ती है। 

मध्यप्रदेश शासन के खर्च पर नीदरलैंड और हालैंड की यात्रा पर भी गए 
2014 में मध्यप्रदेश शासन के खर्च पर नीदरलैंड और हालैंड की यात्रा पर भी गए , ताकि वहां की तकनीक का लाभ प्रदेश के किसानों को भी मिल सके।15 दिवसीय इस यात्रा में बागवानी में अवांछित सिंचाई और दवाई /खाद के अति छिड़काव को नियंत्रित करने की तकनीक सीखी। सन 2018  में उनके भाई समरथ पाटीदार और भतीजे कैलाश पाटीदार ने इजराइल की यात्रा की, वहां उन्होंने आधुनिक कृषि तकनीकों को देखा और समझा।

80 बीघा में अंगूर,40 बीघा में अनार, 40 बीघा में स्ट्राबेरी और 8 बीघा में एप्पल बेर की खेती 
श्री पाटीदार ने बताया कि फ़िलहाल संयुक्त परिवार की 300 बीघा ज़मीन में बागवानी की जा रही है। 80 बीघा में अंगूर,40 बीघा में अनार, 40 बीघा में स्ट्राबेरी और 8 बीघा में एप्पल बेर की खेती की जाती है। स्ट्राबेरी चार माह की फसल है, जिसे सितंबर में लगाया जाता है और सर्दियों में उत्पादन आ जाता है। इसके लिए हर साल अमेरिका से 18 हज़ार पौधे  मंगाए जाते हैं। ड्रिप इरिगेशन में भी विदेश से आयातित खाद का इस्तेमाल किया जाता है। यह खाद शक्तिशाली होता है इसलिए इसकी मात्रा कम लगती है। गोबर का खाद ज़्यादा मात्रा में प्रयोग किया जाता है। अंगूर का उत्पादन 12 टन /एकड़ और स्ट्राबेरी से हर मौसम में 3 लाख रु /एकड़ का मुनाफा मिल जाता है। अनार और एप्पल बेर भी अच्छी कमाई देते हैं। अंगूर एवं अन्य फसल को स्थानीय स्तर पर नहीं बेचा जाता है, बल्कि दिल्ली और देश के बड़े महानगरों में भेजा जाता है। वहां गुणवत्ता के हिसाब से अच्छी कीमत मिल जाती है।