आपको मालामाल कर सकती है अश्वगंधा की खेती

आपको मालामाल कर सकती है अश्वगंधा की खेती

भोपाल, अश्वगंधा चने की खेती से बेहतर है। छह महीने में इसकी फसल तैयार हो जाती है। एक एकड़ में किसान अश्वगंधा की खेती कर सवा लाख रुपए की कमाई कर सकता है। अश्वगंधा की जड़, तना और बीज सभी उपयोगी है। इसका उपयोग इम्युनिटी बढ़ाने वाली दवा कोरोनिल बनाने में भी किया गया है। 

अश्वगंधा की खेती कर किसानी आमदनी बढ़ा सकते हैं
अश्वगंधा मिर्च के परिवार से है। इसके बीज मिर्च जैसे ही होते हैं। जहां पानी का भराव नहीं होता और किसानों के सामने संसाधनों की कमी है, वहां अश्वगंधा की खेती कर किसानी आमदनी बढ़ा सकते हैं। एक एकड़ खेत में 10 टन के लगभग गोबर या चार टन जैविक खाद का प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा 15 किलो नाइट्रोजन और इतनी ही मात्रा फॉस्फोरस देकर बुआई करनी होती है। सीधे बीज का छिड़काव कर अगस्त में बुआई कर देते हैं।

5-6 महीने में तैयार हो जाता है अश्वगंधा
अश्वगंधा की खेती में पानी बहुत कम लगता है। 150 से 160 दिन में इसकी फसल तैयार हो जाती है। फल आधे पक जाते हैं। पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, तब ट्रैक्टर चलाकर जोत लेते हैं। इसके बाद जड़ सहित पौधों को इकट्‌ठा कर लेते हैं। जड़ को तने से काटकर धो कर सुखा लेते हैं। वहीं, तने और बीज को अलग कर लेते हैं। एक एकड़ में 300 किलो जड़, 15 क्विंटल तने का भूसा और 20 से 25 किलो के लगभग बीज का उत्पादन होता है।

अश्वगंधा का है औषधीय उपयोग
अश्वगंधा की पत्तियां कैंसर और मोटापा रोकने में उपयोगी है। वहीं, फल और बीज एस्टेरॉयड बनाने के काम में आता है। जड़ों का उपयोग गठिया, कमर दर्द, ऑर्थराइटिस में होता है। इसकी जड़ का पाउडर कोविड सहने की क्षमता बढ़ाता है। इम्युनिटी बढ़ाने वाली दवा कोरोनिल में इसी का उपयोग किया गया है। ये कोरोना की प्रोफाइल एक्टिव ड्रग में प्रयोग किया जाता है।

उपयुक्त जलवायु
अच्छे जल निकास वाली बलुई, दोमट मिट्टी या हल्की लाल मृदा, जिसका पीएच मान 7.5 से 8 हो, प्रयुक्त मानी जाती है।

बीज की मात्रा
नर्सरी के लिए प्रति हेक्टेअर पांच किलोग्राम व छिड़काव के लिए प्रति हेक्टेअर 10 से 15 किलो बीज की जरूरत पड़ती है। बोआई के लिए जुलाई से सितंबर तक का समय उपयुक्त माना जाता है।

बीज शोधन
बीज को डायथेन एम-45 से उपचारित करते हैं। एक किलोग्राम बीज को शोधित करने के लिए 3 ग्राम डायथेन एम. का प्रयोग किया जाता है।

रोपण की विधि
रोपाई के समय इस बात का ध्यान रखें कि दो पौधों के बीच 8 से 10 सेमी की दूरी हो तथा पंक्तियों के बीच 20 से 25 सेमी की दूरी हो। बीज एक सेमी से ज्यादा गहराई पर न बोएं।

उर्वरक का प्रयोग
बोआई से एक माह पूर्व प्रति हेक्टेअर पांच ट्रॉली गोबर की खाद या कंपोस्ट की खाद खेत में मिलाएं। बोआई के समय 15 किग्रा नत्रजन व 15 किग्रा फास्फोरस का छिड़काव करें।

प्रजाति एवं सिंचाई
डब्लू.एस-20 (जवाहर), डब्लूएसआर, पोषिता अश्वगंधा की अच्छी प्रजातियां हैं। नियमित समय से वर्षा होने पर फसल की सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। आवश्यकता पड़ने पर जीवन रक्षक सिंचाई अवश्य करें।

छटाई व निराई
बोई गई फसल को 25 से 30 दिन बाद हाथ से छांट देना चाहिए। इससे लगभग 60 पौधे प्रतिवर्ग मीटर यानी 6 लाख पौधे प्रति हेक्टेअर अनुरक्षित हो जाते हैं।

फसल सुरक्षा
अश्वगंधा पर रोग व कीटों का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। कभी-कभी माहू कीट तथा पूर्णझुलसा रोग से फसल प्रभावित होती है। ऐसी परिस्थिति में मोनोक्रोटोफास का डाययेन एम- 45, तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर बोआई के 30 दिन के अंदर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन के अंदर दोबारा छिड़काव करें।

उत्पादन
फसल बोआई के 150 से 170 दिन में तैयार हो जाती है। पत्तियों का सूखना फलों का लाभ होना फसल की परिपक्वता का प्रमाण है। परिपक्व पौधे को उखाड़कर जड़ों को गुच्छे से दो सेमी ऊपर से काट लें फिर इन्हें सुखाएं। फल को तोड़कर बीज को निकाल लें।

क्या है लाभ
अश्वगंधा की फसल से प्रति हेक्टेअर 3 से 4 कुंतल जड़ 50 किग्रा बीज प्राप्त होता है। इस फसल में लागत से तीन गुना अधिक लाभ होता है।

किसानों को इस तरह लाभ
एक एकड़ अश्वगंधा लगाने पर किसानों को मुश्किल से 10 से 15 हजार का खर्च आता है। छह महीने में एक एकड़ से वह सवा लाख रुपए का अश्वगंधा बेच सकता है। इसके बीच 50 से 60 रुपए किलो की दर से बिकते हैं। जड़ 250 से 300 रुपए की दर से बिकती है। कोविड में ये 450 रुपए किलो की दर से बिकी। वहीं, तने को भूसा बना लेते हैं। ये भी 15 से 20 रुपए किलो की दर से बिक जाता है। इस फसल में किसी तरह के रोग नहीं लगते हैं।