वैज्ञानिकों ने विकसित की सोयाबीन की नई किस्म

वैज्ञानिकों ने विकसित की सोयाबीन की नई किस्म

मप्र की धरती उगलेगी नई प्रजाति का 'सोना'

भोपाल, सोया प्रदेश मप्र में कृषि वैज्ञानिकों ने सोयाबिन की नई प्रजाति विकसित की है। इस प्रजाति के बीज के इस्तेमाल से किसान मालामाल हो जाएंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बीज से 1 हेक्टेयर में 7 क्विंटल से अधिक की पैदावार होगी। भारत सरकार आरवीएसएम 2011-35 प्रजाति को राष्ट्रीय स्तर पर अनुमोदित किया है। गौरतलब है कि 2022 तक किसानों की आय दोगना करने के अभियान को सफल बनाने में सरकार के साथ कृषि वैज्ञानिक भी लगे हुए हैं। इसी कड़ी में सोया तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए मुरैना के कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीके तिवारी ने 5 साल के अनुसंधान के बाद सोयाबीन की ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसमें किसान को एक हेक्टेयर में 32 क्विंटल तक पैदावार (5 से 7 क्विंटल अधिक) और 19 फीसदी तेल मिलेगा।

38 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा

सोयाबीन की आरवीएसएम 2011-35 प्रजाति साल 2015 से 2020 तक गहन अनुसंधान के बाद तैयार की जा सकी है। 98 दिन में पैदावार देने वाली इस प्रजाति को 1994 के बाद फिर से विकसित किया गया है ताकि किसानों को एक हेक्टेयर में 30 से 32 क्विंटल तक पैदावार मिल सके। मालवा के किसान प्रदर्शन के तौर पर 32 क्विंटल तक उत्पादन ले चुके हैं। एक हेक्टेयर में बोवनी के लिए 65 से 70 क्विंटल बीज की जरूरत होगी। नई प्रजाति की विशेषता है कि इसमें 38 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा मिलेगी और 19 फीसदी तक तेल जो पुरानी किस्म से 20 फीसदी ज्यादा है।

हार्वेस्टर से नुकसान नहीं

आरवीएसएम 2011-35 प्रजाति की फसल को हार्वेस्टर से कटवाने पर फलियों का नुकसान नहीं होता। दाना भी सुरक्षित मिलता है, क्योंकि इस प्रजाति की सोयाबीन का पौधा जमीन से 5 से 6 फीट ऊपर होने के कारण हार्वेस्टर इसे सुरक्षित तरीके से काटकर भूसा व दाना को अलग कर देता है।
1994 में विकसित हुई थी 

जेएस-335 प्रजाति

अभी जवाहर सोयाबीन यानी जेएस-335 प्रजाति की सोयाबीन उगाई जाती है। यह प्रजाति सीहोर में साल 1994 में तैयार की गई थी। इस प्रजाति में रोग लगने से उत्पादन कम आने लगा था जिससे किसानों को नुकसान हो रहा था। इस प्रजाति में एक हेक्टेयर में 20 से 25 क्विंटल पैदावार होती है। वहीं इस प्रजाति में एक क्विंटल सोयाबीन में 16 से 17 लीटर तेल ही निकलता है जबकि नई प्रजाति में एक क्विंटल में करीब 19 लीटर तेल निकलेगा।

किसान लेंगे लाभ

अब देशभर के किसान इसके बीज को अपनाकर सोयाबीन की फसल बड़े पैमाने पर ले पाएं। यलो मोजेक वायरस से सुरक्षित रहने के कारण इस प्रजाति की फसल में तेल का प्रतिशत अच्छा बना रहता है। चारकोल राठ कीटव्याधि से सुरक्षा मिलने के कारण सोयाबीन का पौधा जड़ साइड से सूखता नहीं है। पुरानी प्रजाति 110 से 115 दिन में पककर तैयार होती है।