जैविक खाद बनाने वाले प्लांट बन गए कचरा, 'गोबर' में डूब गया मुरैना ननि का करोडों रुपया

जैविक खाद बनाने वाले प्लांट बन गए कचरा, 'गोबर' में डूब गया मुरैना ननि का करोडों रुपया

अवधेश डंडोतिया

मुरैना, मुरैना शहर में कचरे के साथ फेंके जाने वाले गोबर से जैविक खाद (केंचुआ पद्धति से) बनाकर, नगर निगम की आय बढ़ाने की योजना बनाई गई थी, इसके लिए जैविक खाद के कई प्लांट बनाए, लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी। योजना तो गोबर से जैविक खाद बनाक करोड़ों रुपए कमाने की थी, लेकिन हकीकत यह है कि जैविक खाद प्लांट पर नगर निगम ने जितना खर्च किया वह भी डूब गया और जैविक खाद बनाने के यह प्लांट खुद ही कचरे में तब्दील हो गए। पूरे प्रदेश में मुरैना शहर ऐसा है, जहां हर रोज जितना कचरा निकलता है उसमें आधी से ज्यादा मात्रा में मवेशियों का गोबर होता है। नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार मुरैना शहर में 19 हजार 500 से ज्यादा भैंसे पाली जा रही हैं। शहर के कॉलोनी, मोहल्लों की सड़कों से लेकर पार्कों तक में यह भैंस बांधी जा रही है। इन भैसों से इतना गोबर निकलता है कि रोज सुबह सड़कों के किनारे से गोबर को उठाने के लिए एक दर्जन से ज्यादा डंपर व ट्रैक्टर-ट्रॉली, मिनी जेसीबी लगाई जाती है। 

प्रतिदिन 48 टन निकता है गोबर 

नगर निगम के रिकॉर्ड अनुसार शहर में हर रोज 92 से 95 टन कचरा निकलता है, इसमें से 45 से 48 टन गोबर होता है। इस गोबर के कारण अधिकांश नाले-नालियां चोक हो गए हैं। डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन जाने वाले वाहनों में कचरे से ज्यादा गोबर भर दिया जाता है। यह गोबर कचरे में फेंका जाता है।  समस्या को खत्म करने के लिए नगर निगम ने छह माह पहले इसी गोबर से केंचुआ पद्धति से जैविक खाद बनाने की योजना बनाई। इसके लिए निगम ने मुरैना कृषि विज्ञान केंद्र की मदद ली। देवरी गौशाला के पास जैविक खाद बनाने का प्लांट बनाया। इससे पहले पुराने बस स्टैंड स्थित ननि के गाड़ी अड्डा में भी ऐसा ही एक प्लांट बनाया। अब दोनों प्लांट में मिट्टी व कचरा भरा है। इनसे एक बार भी जैविक खाद नहीं बनाया गया।

गोबर देख भाग गई कंपनी

हर साल स्वच्छता अभियान में पिछडऩे के बाद नगर निगम ने 2018 में शहर की सफाई व्यवस्था निजी कंपनी को सौंप दी। सफाई का ठेका लेने वाली ईको ग्रीन नाम की कंपनी ने कुछ महीने काम किया। कंपनी के कर्मचारी व वाहन जहां-जहां कचरा एकत्रित करने जाते वहां उन्हें गोबर सबसे ज्यादा मिलता। कचरा कलेक्शन वाहनों में इतना गोबर भर दिया जाता कि वाहन गड्ढों में फंस जाते। गोबर के कारण ठेका कंपनी ऐसी परेशान हुई, कि अमानत राशि निगम को जब्त कराकर काम बंद करके चली गई। उसके बाद कोई कंपनी सफाई का ठेका लेने तैयार नहीं हुई।

मवेशी पालन का बढ़ा चलन 

मुरैना शहर में मवेशियों की संख्या इतनी है, जितनी शायद ही किसी नगर निगम में हो। हालत यह है कि एक घर में दो से चार-चार भैंस बंधी हैं। लोगों के पास मवेशी बांधने के लिए घर में जगह नहीं, लेकिन वह सड़क किनारे, गलियों में और यहां तक कि डिवाइडरों के किनारे खूंटा गाड़कर मवेशी बांध रहे हैं। इसके पीछे का कारण बड़ा रोचक है। मुरैना जिले में मिलावटी व नकली दूध का डर ऐसा है, कि अधिकांश लोग डेयरियों से दूध खरीदने में डरते हैं। बस इसी डर ने शहर में भैसों की संख्या बढ़ा दी है। नकली व मिलावटी दूध से बचने के लिए लोग अपने आस-पास ही पल रही किसी भैंस का दूध खरीदते हैं।  
ञ्च यह बात सही है कि प्रदेश के किसी भी नगर पालिका या नगर निगम क्षेत्र में इतना गोबर नहीं निकलता, जितना मुरैना में निकलता है। कचरा कलेक्शन वाहनों तक को लोग गोबर से भर देते हैं। हम इस समस्या का कोई हल निकालने के लिए मंथन कर रहे हैं। गोबर से खाद बनाने के प्लांट कितने कारगर हैं, इसकी समीक्षा कर उन्हें फिर से शुरू करने की योजना बनाएंगे। -संजीव कुमार जैन, कमिश्नर, नगर निगम मुरैना