आदिवासियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी मप्र सरकार की हेरिटेज वाइन पॉलिसी

आदिवासियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी मप्र सरकार की हेरिटेज वाइन पॉलिसी

भोपाल, मध्यप्रदेश में होने जा रहे उपचुनाव के बीच सीएम शिवराज सिंह चौहान ने एक और बड़ी घोषणा की है। इस घोषणा से प्रदेश के आदिवासी बाहुलय क्षेत्रों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। यही नहीं, इससे जनजातीय वर्ग आत्मनिर्भर भी होगा। मप्र में आदिवासियों की आबादी 21 प्रतिशत है। वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या एक करोड़ 53 लाख है। मप्र में हर पांचवां व्यक्ति अनुसूचित जनजाति वर्ग का है। दरअसल, झाबुआ में मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार आदिवासियों को महुआ से शराब बनाने की इजाजत देगी। वो यहां जनजातीय सम्मेलन शामिल हुए थे। शिवराज ने कहा कि आदिवासियों को उनकी परंपरा के अनुसार शराब बनाने की छूट दी जाएगी। 

पूर्व एपीसीसीएफ डॉ. रामगोपाल सोनी ने साझा किया अपना अनुभव, बोले

मप्र के रिटायर अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. रामगोपाल सोनी ने 'जागत गांव हमार' से अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि राज्य सरकार का महुआ की हेरिटेज शराब बनाने का निर्णय आदिवासियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। चूंकि आदिवासी समाज अत्यधिक मेहनती है और परंपरागत रूप से वो लोग देशी महुआ की शराब पीते रहे हैं। मैं तो नहीं पीता किंतु एक उदाहरण जरूर दूंगा। उन्होंने बताया कि जब मैं पेंच टाइगर रिजर्व में था तो फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर फिल्म निर्माता और एक फाइनेंसर वहां रुके थे। अंग्रेजी शराब पीते थे और देर से सोकर उठते थे। एक दिन जल्दी उठ गए तो उन्होंने बताया की हमने कल देशी शराब बुलाकर पी थी, जो हालांकि दुर्गंध युक्त थी किंतु इससे सिर भारी नहीं हुआ और बहुत अच्छी थी। दूसरा उदाहरण कैप्टन फोरसिथ का है, जिन्होंने लिखा की अल्मोद जो पचमढ़ी से 10 किमी दूर रोरी घाट से 6 किमी छिंदवाड़ा जिले में है। वहां के लोग देशी शराब बनाते थे, जो आइरिस विसकी जैसी लगती है। आगे उन्होंने कहा की अगर उसकी गंध दूर हो जाए सौंफ डालकर तो उसकी स्वीकार्यता अधिक बढ़ जाएगी।

सोनी ने अपना बस्तर का अनुभव साझा करते हुए बताया कि बस्तर के उत्पादन का मैंने संकलन किया था। सम्पूर्ण बस्तर में उस समय जो महुआ फूल मंडी में आया था उसकी मात्रा 30000 एमटी थी। इसके अलावा कुछ मात्रा वो लोग अपने उपयोग के लिए रख लेते होंगे। किंतु पैसों की कमी से वो 90 फीसदी महुआ फूल  बिचौलियों को बेंच देते थे 5 रुपए किलो। बिचौलिए महुआ को उन्हीं गांवों में कच्चे घरों में ही वैज्ञानिक और देशी तरीके से रख देता था। वर्षात तथा ठंड में वही आदिवासी लोग 12 रुपए किलो खरीद कर देशी दारू बनाते थे। आज भी पैसों के अभाव में गरीब आदिवासी महुआ फूल, जो स्टेपल फूड है उसकी डोभरी, लाटा बनाकर खाते हैं, को पहले गर्मी में बेंच देते हैं फिर दो से ढाई गुना कीमत में खरीदकर शराब बनाकर पीते और बेचते हैं। सोनी कहते हैं कि जब बड़े व्यापारी अंग्रेजी शराब बना सकते हैं तो गरीब आदिवासी लोग क्यों नहीं बनाएं। प्रदेश सरकार इसको ब्रांडेड बनाए और उनको इसका लाभ दिलाए। महुआ के बहुत पेड़ जंगल में है जो पूरा तो इक्_ा ही नही कर पाते । वनों में महुआ वन्य प्राणियों का भी उपयोगी फूड है। वन विभाग को चाहिए की रोपण में कुछ प्रतिशत महुआ का भी वृक्ष लगाए। पशु अवरोधक खंती में मेंड़ में दस मीटर की दूरी पर अगर महुआ की गुल्ली ही गड़ा दी जाए, तो बहुत अच्छे पौधे हो जाते हैं, मैने लगवाया था। चूंकि महुआ बहुत अधिक जगह घेरता है, इसलिए इसको निजी भूमि पर कोई नहीं लगाता किंतु वनों में आसानी से लगा सकते हैं। इसके अलावा महुआ के बीज का वानस्पतिक घी बनाने में उपयोग होता है, जो पाम ऑयल से अधिक अच्छा है। महुआ की गुल्ली में जो ऊपर छिलकायुक्त पल्प होता है वह मीठा भी होता है उससे भी देसी दारू बन सकती है अभी वह फेंक दिया जाता है।