मृदा की उर्वरा शक्ति एवं जल धारण क्षमता में वृद्धि के लिए हरी खाद की खेती जरूरी

मृदा की उर्वरा शक्ति एवं जल धारण क्षमता में वृद्धि के लिए हरी खाद की खेती जरूरी

डॉ नेहा सिंह किरार, डॉ. एच. डी. वर्मा (अधिष्ठाता)
डॉ. बृज किाोर शर्मा, कृषि महाविद्यालय, सीहोर 
डॉ. बी. एस. किरार एवं डॉ. यू. एस. धाकड़  (के.वी.के. टीकमगढ़)

सीहोर/टीकमगढ़। फलीदार फसलों को अधिक वानस्पतिक वृद्वि अवस्था में ही फसल को मिटटी में जोतकर सडऩे के उपरांत तैयार जैव पदार्थ को ही हरी खाद कहते हंै। हरी खाद वाली फसलों की जड़ों में ग्रंथियों में (नोडल्स) बेमिकल रेडीकोला जीवाणु पाये जाते हैं,  जो वायुमण्ड से नाइट्रोजन को लेकर फसलों की पूर्ति के साथ अगली फसल के लिये भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा स्तर हो जाती  है । 

वर्तमान में किसान उन्नत तकनीक अपनाकर सघन पद्वति से  खेती कर रहा है।  एक वर्ष में  एक खेत से 2 से 3 फसल उगा रहा है। फसलों के अधिक उत्पादन के लिये असन्तुलित मात्रा में रासायनिक  उर्वरकों एवं कीटनााक दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं। जिससे भूमि की भौतिक एवं रासायनिक संरचना की गुणवत्ता में गिरावट के साथ जल एवं वायु में विषैला प्रभाव बढ़ रहा है। साथ ही रासायनिक उर्वरको एवं दवाओं के प्रयोग से उत्पादित पदार्थ स्वादहीन, विषैले तत्वों की वृद्वि के कारण मुनष्य के शरीर में कई प्रकार  की बीमारियॉं पनपती जा रही है। इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुये जैविक खेती को बढ़ावा देने के उदद्य से हरी खाद की खेती करना वर्तमान समय की आवयकता है। 

हरी खाद के लिये उपयोगी फसल - सनई, ढैंचा, सिस्बेनिया रोस्ट्रेटा, मूंग, उड़द, मैंथी, सैजी एवं फली तुड़ाइ के बाद बरवटी आदि प्रमुख फसलें हैं ।

हरी खाद के लिये चयनित फसलों की प्रमुख विोषताएं - 
हरी खाद के लिये दलहनी फसलों का चयन करें, क्योंकि दलहनी फसलें अधिक मात्रा में जैव पदाथज़् एकत्रित करती है ।फसल अधिक पत्तेदार एवं तीव्र गति से तैयार होनी चाहिये। सम्पूर्ण पौधा मुलायम अंकुरण वाला हो जिससे पूरी फसल शीघ्र सड़कर मिटटी में मिल जाये। फसल लम्बी जड़ वाली हो जिससे पोषक तत्व जमीन के अन्दर से खींचकर पौधे में समाहित करले। हरी खाद के लिये कम खर्च वाली फसल का चयन करें। फसल की जलमांग कम होना चाहिये।

हरी खाद वाली फसल की जड़ों में अधिक ग्रंथिया होना चाहिये। जिससे वायुमण्डलीय नत्रजन का अधिक भूमि में स्थिरीकरण कर सके। ऐसी फसल का चयन करें  जिसके बीज आसानी से प्राप्त हो सके साथ ही सस्ते भी होना चाहिये।

हरी खाद की उन्नत तकनीक 

भूमि-सभी प्रकार की भूमियों में हरी खाद की फसलें उगाई जा सकती है। दोमट एवं भारी मिटटी में ज्यादा अच्छी होती है। इन भूमियों मे फसल की शीघ्र बढ़वार एवं पत्तियां अधिक बनती है । भूमि की तैयारी-रबी फसल कटने के बाद कल्टीवेटर या डिस्क हैरो से जुताई करे और बुवाई के समय एक बार जुताई एवं पाटा चलाकर खेत को ठीक से तैयार कर लेना चाहिये।

बीजदर   

ढैंचा-  14-16 कि.ग्रा./एकड़
सनई -  18-20 कि.ग्रा./एकड़
मूंग/उड़द -  12-14 कि.ग्रा./एकड़

बुवाई का समय

हरी खाद के लिये बीज की बुवाई 20 से 30 मई तक कर देना चाहिये।

बुवाई की विधि

हरी खाद के लिये बीज को छिड़क कर बो देना चाहिये । जिससे अधिक पौध संख्या होने पर जैव पदार्थ अधिक प्राप्त होगा ।

सिंचाई - गर्मी में हरी खाद की फसल लेने के कारण 4-5 सिंचाईयों की आवयकता पड़ती है। फसल सूखना नहीं चाहिये भूमि की मांग के अनुसार सिंचाई करते रहना चाहिये।

फसल की जुताई का समय

हरी खाद के लिये उगाई जाने वाली फसल  को बुवाई के 40 से 45 दिन की अवस्था में फसल पर पाटा चलाकर उसकी डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से जुताई कर मिटटी में मिला देना चाहिये  और सिचांई कर देना चाहिये और शीघ्र फसल के सडऩे के लिये 1 ली. प्रति एकड़ बायोडिकम्पोजर का घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिये । जिससे खरीफ फसल की समय पर बुवाई की जा सके। 
सनई की हरी खाद से प्राप्त जैव पदार्थ एवं पोषक तत्वों की मात्रा - 

क्र.                विवरण                   मात्रा                              जैव पदार्थ

1                 हरा जैव पदार्थ          7.36 टन प्रति एकड़

2                 सूूखा जैव पदार्थ       1.88 टन प्रति एकड़ 

पोषक तत्वों की मात्रा

1 नत्रजन 18.16 कि.ग्रा. प्रति एकड़ 
2 फास्फोरस 1.40 कि.ग्रा. प्रति एकड़ 
3 पोटाश 20.76 कि.ग्रा. प्रति एकड़ 

हरी खाद में उपलब्ध पोषक तत्वो की अन्य खादों से तुलना - 

क्र. खाद  नत्रजन (:) फास्फोरस (:) पोटाश (:)
1 हरी खाद  2.5  0.5  1.5
2 गोबर खाद  0.50  0.20  0.50
3 वर्मी कम्पोस्ट 0.80  0.50  0.60

हरी खाद के लाभ -

हरी खाद के प्रयोग से भूमि में निम्नानुसार लाभ होते है -

यह भूमि में जैविक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाती है, जो मृदा सूक्ष्म जीवों की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
हरी खाद की फसलों द्वारा भूमि की निचली सतहो से अवाोषित पोषक तत्व भूमि की ऊपरी सतह पर आ जाते है ।
यह कुछ पोषक तत्वों जैसे - फस्फोरस, कैलियम, पोटेाियम, मैग्नीाियम एवं आयरन आदि की उपलब्धता को बढ़ाते हैं।
यह भूमि की संरचना को भी सुधारती है।
हरी खाद मृदा में सूक्ष्म-जीवों की संख्या को बढ़ाते है।
खरपतवारों को दबाकर उनके नियंत्रण में सहायता करती है।
हरी खाद क्षारीय एवं लवणीय भूमियों का सुधार करती है।
हरी खाद अधिक उत्पादन प्राप्त करने मेें सहायक होती है।